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Thagon Ka Jaal: गोपाल और तीन धूर्त ठग- प्यारे दोस्तों! दुनिया में ऐसे बहुत से लोग हैं जो हमें बेवकूफ बनाकर अपना काम निकालना चाहते हैं। इसे कहते हैं—Thagon Ka Jaal। वे झूठ को इतने भरोसे के साथ बोलते हैं कि हमें अपनी ही आँखों पर शक होने लगता है। लेकिन जो इंसान अपनी बुद्धि का इस्तेमाल करता है, वह इस जाल को काट सकता है। आज की कहानी 'रतनपुर' के एक समझदार किसान गोपाल की है। गोपाल के पास एक 'खास चीज़' थी जिसे हथियाने के लिए तीन ठगों ने एक पक्का प्लान बनाया। पर क्या वे गोपाल को ठग पाए? या खुद ठगे गए? आइए जानते हैं!
कहानी: अक्ल बड़ी या भीड़?
गोपाल और उसका 'कीमती' इनाम
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रतनपुर गाँव का गोपाल बहुत ही मेहनती और खुशमिज़ाज इंसान था। एक बार वह पास के शहर में लगे मेले में गया। वहां उसने कुश्ती प्रतियोगिता में भाग लिया और जीत गया। इनाम में उसे एक हट्टा-कट्टा, गोल-मटोल बकरा मिला। बकरा इतना सेहतमंद था कि किसी का भी मन ललचा जाए।
गोपाल बकरे को अपने कंधे पर लादकर (क्योंकि बकरा थक गया था) खुशी-खुशी अपने गाँव लौट रहा था। रास्ता एक घने जंगल से होकर गुज़रता था।
उसी जंगल में तीन मशहूर ठग रहते थे—नत्थू, लल्लू और घसीटा। उनकी नज़र गोपाल और उसके मोटे बकरे पर पड़ गई। नत्थू ने धीरे से कहा, "भाई! देखो क्या माल है। अगर यह बकरा मिल जाए, तो हफ्ते भर की दावत का इंतज़ाम हो जाएगा।" लल्लू बोला, "लेकिन यह आदमी तो पहलवान लगता है। इससे छीनना मुश्किल होगा।" घसीटा (जो सबसे चालाक था) मुस्कुराया, "छीनेंगे नहीं, दिमाग से खेलेंगे। हम इसे ऐसा भ्रमित (Confuse) करेंगे कि यह खुद ही बकरा छोड़कर भाग जाएगा।"
ठगों का मास्टरप्लान
ठगों ने योजना बनाई। वे जंगल के रास्ते में थोड़ी-थोड़ी दूर पर अलग-अलग खड़े हो गए।
गोपाल मजे में गाना गुनगुनाते हुए जा रहा था। तभी उसे पहला ठग, नत्थू, मिला। नत्थू ने हैरान होने का नाटक किया और बोला, "अरे भाई साहब! राम-राम! लेकिन यह क्या? आप जैसे समझदार आदमी ने कंधे पर गंदा कुत्ता क्यों उठा रखा है?"
गोपाल ने रुककर उसे घूरा। "अरे भाई, आँखें हैं या बटन? यह कुत्ता नहीं, बकरा है। इनाम में जीता है मैंने।" नत्थू ने हँसते हुए कहा, "भाई, गुस्सा क्यों होते हो? मुझे तो कुत्ता ही दिखा, सो बोल दिया। मर्जी आपकी, चाहे शेर उठाओ या कुत्ता।" गोपाल बड़बड़ाया, "पागल आदमी है," और आगे बढ़ गया। लेकिन उसके मन में एक छोटा सा सवाल आ गया—"क्या यह सच में कुत्ता लग रहा है?" उसने बकरे को छूकर देखा, वह बकरा ही था।
भ्रम का दूसरा वार
थोड़ी दूर जाने पर दूसरा ठग, लल्लू, एक पेड़ के नीचे बैठा मिला। जैसे ही गोपाल पास आया, लल्लू ने नाक सिकोड़ी। "छी-छी! भाई साहब, आप ब्राह्मण होकर एक मरे हुए बछड़े को कंधे पर लादकर ले जा रहे हो? पाप लगेगा, पाप!"
गोपाल का माथा ठनका। उसने बकरे को नीचे उतारा और गौर से देखा। बकरा 'मैं-मैं' कर रहा था। गोपाल चिल्लाया, "अरे बेवकूफ! यह ज़िंदा बकरा है, मरा हुआ बछड़ा नहीं। दिखता नहीं क्या?"
लल्लू ने हाथ जोड़ लिए, "माफ़ करना मालिक! मेरी ही नज़र कमज़ोर होगी। पर मुझे तो यह बछड़ा ही लग रहा है। आप जानो, आपका काम जाने।" गोपाल ने बकरे को फिर से उठाया और चल पड़ा। लेकिन अब उसकी चाल धीमी हो गई थी। वह सोचने लगा, "पहला आदमी इसे कुत्ता बोल रहा था, दूसरा बछड़ा... कहीं मेरी मति तो नहीं फिर गई? या यह कोई जादुई जानवर (Ghost Animal) है जो रूप बदल रहा है?"
गोपाल की परीक्षा (Logic का इस्तेमाल)
अब गोपाल डरा हुआ था। तभी उसे तीसरा ठग, घसीटा, मिला। घसीटा ने उसे देखते ही ज़ोर से चिल्लाना शुरू किया, "भागो! भागो! यह आदमी गधा उठाकर ला रहा है! यह पक्का कोई जादूगर है!"
अब गोपाल के सब्र का बांध टूट गया। तीन अलग-अलग लोग, तीन अलग-अलग जानवर बता रहे हैं—कुत्ता, बछड़ा और गधा! आम तौर पर कोई भी डरकर बकरा फेंक देता और भाग जाता (जैसे पुरानी कहानियों में होता है)। गोपाल ने भी बकरे को ज़मीन पर पटक दिया।
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तीनों ठग झाड़ियों के पीछे छिपकर यह देख रहे थे और खुश हो रहे थे। लेकिन यहीं गोपाल ने अपना 'Logic' (तर्क) लगाया। उसने सोचा, "एक मिनट! यह जानवर 'मैं-मैं' कर रहा है, यह घास खा रहा है, और इसके सींग भी हैं। गधा, कुत्ता या बछड़ा 'मैं-मैं' नहीं करते। इसका मतलब यह जानवर नहीं बदल रहा, वो तीन लोग मिले हुए हैं!"
गोपाल को अपनी गलती और उन ठगों की चाल समझ आ गई। उसने सोचा, "अच्छा बच्चों! मुझे उल्लू बनाओगे? अब देखो मैं क्या करता हूँ।"
गोपाल का पलटवार
गोपाल ने ज़ोर से चिल्लाकर कहा (ताकि छिपे हुए ठग सुन सकें), "हाय राम! यह तो सचमुच भूतिया जानवर है। कभी कुत्ता, कभी गधा! मैं इसे यहीं छोड़कर भागता हूँ!" गोपाल बकरे को वहीं छोड़कर आगे भागा और एक घनी झाड़ी के पीछे छिप गया।
तीनों ठग खुश होकर बाहर निकले। "देखा! कहा था ना, अक्ल बड़ी होती है भैंस नहीं!" घसीटा हँसा। वे तीनों बकरे को पकड़ने के लिए लपके।
तभी गोपाल झाड़ी से बाहर निकला। उसके हाथ में उसका मज़बूत लठ (Stick) था। गोपाल ने कड़क आवाज़ में कहा, "क्यों भाई? गधा और कुत्ता खाने का शौक कब से पाल लिया?"
तीनों ठग हट्टे-कट्टे पहलवान गोपाल को लठ लेकर सामने खड़ा देख कांपने लगे। उन्होंने सोचा था गोपाल भाग गया होगा। गोपाल ने अपनी पहलवानी दिखाई और लठ घुमाना शुरू किया। "आ जाओ, आज इनाम के साथ-साथ थोड़ी कुश्ती भी हो जाए!"
तीनों ठग अपनी जान बचाकर ऐसे भागे कि उन्होंने पीछे मुड़कर भी नहीं देखा। गोपाल ने हँसते हुए अपना प्यारा बकरा उठाया, उसकी पीठ थपथपाई और बोला, "चल मेरे शेर! दुनिया चाहे तुझे गधा कहे या कुत्ता, तू तो मेरा चैंपियन बकरा है।"
निष्कर्ष: भरोसा खुद पर करो
गोपाल घर पहुँचा और उसने यह किस्सा सबको सुनाया। उसने साबित कर दिया कि अगर हम अपनी बुद्धि और आँखों पर भरोसा करें, तो कोई भी 'ठगों का जाल' हमें फंसा नहीं सकता।
इस कहानी से सीख (Moral)
इस कहानी से हमें यह ज़बरदस्त सीख मिलती है:
आत्मविश्वास (Self-Confidence): दूसरों की बातों में आकर अपनी समझ पर शक न करें। "सुनो सबकी, लेकिन करो अपने मन (और अक्ल) की।"
तर्क शक्ति: जब हालात अजीब लगें, तो डरने के बजाय लॉजिक से सोचें। सच्चाई सामने आ जाएगी।
Wikipedia Link
अधिक जानकारी के लिए देखें: विश्वासघात (Confidence trick) - विकिपीडिया
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